Kharinews

"विश्व रंग" महोत्सव में बिखरे रबीन्द्र संगीत के रंग, भारत भवन में सात दिन तक रहेगी चित्रकला प्रदर्शनी

Nov
05 2019

भोपाल: 05 नवंबर/ टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव ‘विश्व रंग के दूसरे दिन मंगलवार शाम 7 बजे रबींद्र भवन में कोलकाता के ख्यात रंगकर्मी और अभिनेता, निर्देशक, पीलू भट्टाचार्य ने रबींद्र संगीत एवं हिंदुस्तानी फिल्म संगीत व नृत्य की प्रस्तुति से ऐसा समां बांधा कि लोग मंत्रमुग्ध होकर रह गए। पहले बांग्ला में नृत्य की प्रस्तुति और इसके बाद उस संगीत पर आधारित हिंदुस्तानी फिल्मी व नाट्य गीत-संगीत की प्रस्तुति ने लोगों के मन पर अमिट छाप छोड़ी।

कई लोगों को यह पता ही नहीं था कि ये गीत जो वे सुनते हैं-छूकर मेरे मन को तूने किया क्या इशारा…, बचपन के दिन भुला ना देना.., जाएं तो जाएं कहां…, नन्हां सा पंछी…, बंधन छुटा, पंछी उड़ा जैसे कई प्रसिद्ध हिंदी फिल्मी गीत रबींद्र संगीत पर आधारित हैं। 21 कलाकारों द्वारा एक के बाद एक 17 गीत-संगीत की प्रस्तुतियों को देखने-सुनने के लिए दर्शकों की इतनी भीड़ उमड़ी थी कि रवींद्र भवन का सभागृह छोटा पड़ गया। लगभग दो घंटे तक कई दर्शक खड़े रहकरा इसका आनंद लेते रहे।

विशेष बातचीत में पीलू भट्टाचार्य ने बताया रबींद्रनाथ टैगोर के संगीत को लेकर विश्वरंग के निदेशक और रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे से उनकी चर्चा हुई और इसके बाद इस ‘रिफ्लेक्शन-गीत एवं नृत्य की प्रस्तुति की रूपरेखा बनी और उन्होंने 17 गीत-नृत्यों का संयोजन किया। भोपाल में यह रिफ्लेक्शन की पहली प्रस्तुति है, और इसकी तैयारी के साथ ही अब तक 18 प्रोग्राम बुक हो चुके हैं। इसमें कई प्रोग्राम तो हॉलेंड, पोलेंड, जर्मनी सहित कई देशों के भी हैं। श्री भट्टाचार्य ने बताया रबींद्रनाथ टैगोर एक समुद्र के भांति हैं। वे कई कलाओं को अपने अंदर समेटे हुए हैं। इस समुद्र में जो भी गहराई तक गोते लगाएगा, उसे ऐसे ही कीमती मोती मिलते रहेंगे। उन्होंने रिफलेक्शन की परिकल्पना के लिए विश्व रंग के निदेशक श्री संतोष चौबे को साधुवाद दिया और कहा कि यह सब उनकी ही प्रेरणा से संभव हो पाया है।

रबींद्र संगीत की कोरस में प्रस्तुति ने लुभाया

विश्व रंग के तहत मंगलवार शाम पूर्व रंग के तहत रीना सिन्हा के रैनी वृंदा ग्रुप ने रबींद्र संगीत को कोरस में लोगों के सामने प्रस्तुत किया । रबींद्र संगीत को कोरस में सुनकर लोगों ने एक नए रूप में रबींद्र संगीत को महसूस किया। इस संबंध में चर्चा करते हुए रीना सिन्हा बताती हैं कि आज युवाओं को रबींद्रनाथ टैगोर से प्रेरणा लेनी चाहिए, उनकी भावनाएं ,उनकी रचनाएं, उनका संगीत, उनका लेखन, उनका रंगमंच का अनुभव सहित अनेक विधाएं हैं । जो सीखी जानी चाहिए। इसलिए भावी पीढ़ी को इसे अवगत कराने के लिए एक यंग ग्रुप हमने तैयार किया है । इसके माध्यम से हम संगीत को कोरस में करते हैं। रीना सिन्हा बताती हैं कि वह बंगाल की रहने वाली हैं और रबींद्रनाथ टैगोर उनके आदर्श हैं , इसलिए यह विश्व रंग का अनुभव जीवनभर अपने साथ संजोए रखना चाहती हैं।

विश्वरंग : मंगलाचरण में आमीर खान ने सरोद पर प्रस्तुत किया वंदे मातरम्…

टैगोर विश्विद्यालय द्वारा आयोजित विश्व रंग के दूसरे दिन की शुरुआत मंगलाचरण में सरोद वादन के साथ हुई। उल्लेखनीय है कि इस अवसर पर विश्व प्रख्यात सरोद वादक आमीर खान ने सरोद पर वंद मातरम्.. की अविस्मरणीय प्रस्तुति से सबके दिलों में राष्ट्रप्रेम की अलख जगा दी। आमीर खान के साथ उनके पिता
नफीस खान ने तबले पर टैगोर के रचित गीतों की सुरमय प्रस्तुति भी दी। आमीर खान ने एकला चोलो, सघानो घानों रात्रि जैसे गुरुदेव द्वारा रचित बेहद लोकप्रिय गीतों की सरोद पर प्रस्तुत किये। इस दौरान भारत भवन सभागार कला प्रेमियों से खचाखच भरा रहा। प्रस्तुति के बाद सभागार लंबे अंतराल तक तालियों से गूंजता रहा।

विश्वरंग कला का सबसे बड़ा महोत्सव-आमीर

आमीर खान ने कहा कि अब तक मेरे देखे हुए कला उत्सवों में विश्व रंग सबसे बड़ा कला महोत्सव है। मुझे इस मंच पर प्रस्तुति देने में गर्व की अनुभूति हो रही है। विश्व रंग में शामिल होकर मैं गुरुदेव को सच्ची श्रद्धांजलि दे पाया हूं। आमीर के पिता और प्रख्यात तबला वादक नफीस खान ने भी विश्वरंग को साहित्य कला और संस्कृति का सबसे बड़ा मंच बताया। रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे ने दोनों ही कलाकारों को स्मृति चिह्न भेंटकर सम्मानित किए। कार्यक्रम का संचालन टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केंद्र के निदेशक विनय उपाध्याय ने किया।

विश्वरंग : प्रभाकर कोल्टे ने किया नेशनल पेंटिंग प्रदर्शनी का शुभारंभ

अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव विश्व रंग के दूसरे दिन विभिन्न कार्यक्रमों की श्रंखला में 7 दिनों तक चलने वाली नेशनल पेंटिंग प्रदर्शनी का विश्व प्रख्यात चित्रकार प्रभाकर कोल्टे ने शुभारंभ किया। यह प्रदर्शनी भारत भवन की आर्ट गैलरी में लगाई गई है। इस अवसर पर विश्वरंग के निदेशक संतोष चौबे, सुप्रसिद्ध चित्रकार अशोक भौमिक, प्रभाकर कोल्टे, लीलाधर मंडलोई, देवीलाल पाटीदार समेत कला प्रेमी मौजूद रहे। विश्व स्तरीय प्रदर्शनी के लिए एक हजार से अधिक प्रविष्टियां पहुंची थी, जिनमें से 158 पेंटिंग्स को इस प्रदर्शनी में शामिल किया गया है। उल्लेखनीय है कि इस विश्व स्तरीय प्रदर्शनी में दूरदराज के अंचलों के उन युवा चित्रकारों को भी स्थान मिला है जिन्हें आर्ट गैलरियों में नहीं मिल पाती है।

कला से ही दुनिया का द्वंद्व खत्म होगा- सुप्रिया

चित्र प्रदर्शनी में शामिल होने जबलपुर से आईं युवा चित्रकार सुप्रिया अंबर ने कहा कि आज हमारे अंदर एक द्वंद्व है। हम कहीं भटक रहे हैं, लेकिन कला ही एक ऐसा साधन है जिससे हमें आराम मिल सकता है। विश्व रंग पर विशेष बातचीत में उन्होंने बताया कि विश्वरंग अपने नाम को सार्थक कर रहा है, इस कार्यक्रम में विश्व के सभी रंगों को एक जगह समावेशित किया गया है।

ब्रीदिंग स्टोन: तकनीक और रचना का एक सफल मिश्रण

चित्र प्रदर्शनी के दूसरे भाग में विश्वरंग के सह निदेशक लीलाधर मंडलोई द्वारा बनाये गए "ब्रीदिंग स्टोन" अमूर्त छाया चित्रों ने दर्शकों और कला प्रेमियों का मन मोह लिया। लीलाधर मंडलोई ने विशेष बातचीत में बताया वैश्वीकरण के

इस युग में जब सभी रचनाओं को एक ही सतह पर लाने का प्रयास हो रहा है, वहां हम कला को किसी बंधन में बांध नहीं सकते। कला को नई तकनीक से जोड़कर हम आश्चर्यजनक रचनाओं को जन्म दे सकते हैं। आपको बता दें कि इन्होंने पेंटिंग्स को अपनी कल्पना और फोटोग्राफी की तकनीक से जन्म दिया है।
सबसे बेहतरीन चित्रकारों को किया गया सम्मानित राष्ट्रीय चित्र प्रदर्शनी में सर्वश्रेष्ठ चित्रकारी के लिए चारुदत्त पांडे पुणे महाराष्ट्र, भोपाल की सोनल प्रिया सिंह,
राजनंदगांव छत्तीसगढ़ की अनुपमा डे, महाराष्ट्र के कलिब्ध गुरकैत और इलाहाबाद से उत्कर्ष जायसवाल को उनकी बेहतरीन कलाकृतियों के लिए टैगोर विश्वविद्यालय की ओर से 51 हजार रुपये के नगद पुरस्कार के साथ स्मृति चिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।

राजा-रजवाड़ों और राजनीति ने भारतीय कला के परिदृश्य को बदला

टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित विश्वरंग के दूसरे दिन नेशनल सेमिनार ऑन आर्ट्स इन इंडिया का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में पहले सत्र के वक्ता रहे युवा चित्रकार लोकेश जैन ने भारतीय चित्रकला 1850- 1930 तक के परिदृश्य पर बात की। जिसके प्रारंभ में उन्होंने बताया कि ब्रिटिश राज जैसे- जैसे मज़बूत हुआ भारतीय राजा कमजोर हो गए, जिससे भारतीय कला भी कमजोर हुई। इसके बाद अंग्रेजों के खिलाफ शुरू हुए स्वतंत्रता आंदोलनों से
डूब रही भारतीय कला को सहारा मिला और इनकी प्रगति फिर शुरू हो सकी। यह सब सिर्फ इसलिए संभव हो पाया क्योंकि कला के पास हर बंधन से मुक्त होने की खूबसूरती है। वर्तमान में बाज़ार के आने से हम ट्रेंड्स नामक नई विसंगति का सामना कर रहे हैं। परिणाम स्वरूप लोग कला के मूल्य से उसका मूल्यांकन करने लगे हैं।

विश्वरंग महोत्सव भारतीय कला जगत के खालीपन को दूर करेगा- अग्रवाल लखनऊ से विश्वरंग में शामिल होने पहुंचे बहुचर्चित चित्रकार और प्रोफेसर जयकिशन अग्रवाल ने सभागार को संबोधित करते हुए कहा कि शिक्षा ने भारतीय कला को सिंचित किया है। हमने पश्चिमी देशों के मानक पर खुद को
तौला है, इससे हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान नहीं मिल पाई है। अब हमें भारतीय कला के वैश्विक विस्तार के लिए कला शोध को बढ़ावा देना चाहिए। कला शोधार्थियों के आगे आने से आम लोग या कलाप्रेमी भी हमारे कलाकारों को जान पाएंगे।

चित्र और चित्रण की विविधता को दर्शाती है भारतीय कला- रानी

वाराणसी से आमंत्रित चित्रकार स्नेहा रानी ने भारतीय चित्रकला के विकास के बारे में बात करते हुए कहा, भारतीय चित्रकला के विकास में 1815 का दशक महत्त्वपूर्ण है। जिसमें राजा रवि वर्मा और अमृता शेरगिल ने चित्रकला के विकास में निर्णायक भूमिका निभाई थी। इन दोनों की रचनाओं में चित्र और चित्रण की ऐसी खूबसूरत विविधता है जो पूरे भारत को जोड़ती है। ज्ञान और सूचनाओं से भरपूर इस सत्र में गाज़ियाबाद से आई सुमन सिंह और दिल्ली के दिलीप शर्मा ने भी विचार व्यक्त किये। सत्र का प्रवाहमयी संचालन विनय अम्बर ने किया।

नेशनल आर्ट सेमिनार के अंतिम सत्र में इक्कीसवीं शताब्दी की कला पर हुई चर्चा

रबींद्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित कला संस्कृति और साहित्य महोत्सव विश्व रंग के दूसरे दिन नेशनल सेमिनार ऑन आर्ट्स इन इंडिया के अंतिम सत्र में भारत में कला विषय पर सीरज सक्सेना ने भारतीय चित्रकला सन् 2000 से 2019 के परिदृश्य पर चर्चा की। उन्होंने इस दौरान कला के विकास ने शिक्षा की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। सक्सेना ने कहा कि आधुनिक भारत में ग्राफ़िक कला विलुप्त हो रही है। उनकी समीक्षा और प्रदर्शन का अभाव इसका मुख्य कारण है। उन्होंने कला पर बाज़ारवाद के असर को लेकर कहा कि निवेश की मंशा से बनाई कला, कला नहीं होती। कला तो वो है जो कलाकार के हृदय और मस्तिष्क में उपजती है। आज के दौर में फेक चित्रों का चलन भी बढ़ गया है।

दुनिया की बड़ी घटनाओं से चित्रकला प्रभावित हुई- विनय

चित्रकला पर चर्चा करते हुए पटना से विश्वरंग का हिस्सा बनने पहुंचे चित्रकार विनय कुमार अंबर ने कहा कि नब्बे के दशक में दुनिया में हुई कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं ने चित्रकारों को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपना विषय उन्हीं घटनाओं से चुना।

इंटरनेट और नई तकनीक के आगमन के बाद कला जगत में विविधताओं ने अपने पैर पसारे। स्टूडियो और मटीरियल के साथ ही प्रदर्शन में भी बहुत विकास हुआ है। सन् 2000 के बाद भारतीय आर्ट को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। कार्यक्रम के अंत में सत्रों में सभी आमंत्रित वक्ताओं को स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया।

कार्यक्रम के संयोजक अशोक भौमिक ने सभी वक्ताओं का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम का संचालन विनय अम्बर ने किया।

6 नवंबर के प्रमुख कार्यक्रम

6 नवंबर को विश्व रंग महोत्सव की शुरुआत सुबह 10 बजे भारत भवन में मंगलाचरण से होगी। इसमें अमित मलिक द्वारा वायोलिन वादन से शुरुआत की जाएगी। इसके अलावा कविता पाठ भी होगा। शाम 4 बजे स्वराज भवन में संवाद – रंगमंच का नेपथ्य आयोजित किया जाएगा। इसके अलावा शाम 6 बजे से पूर्व रंग में नया थिएटर द्वारा रंग संगीत की प्रस्तुति दी जाएगी। शाम 7 बजे से उषा गांगुली के निर्देशन में नाट्यकृति चाण्डालिका की प्रस्तुति होगी।

Related Articles

Comments

 

खाद्य पदार्थो के दाम बढ़ने से अक्टूबर में खुदरा महंगाई दर 4.62 फीसदी हुई (लीड-1)

Read Full Article
0

Subscribe To Our Mailing List

Your e-mail will be secure with us.
We will not share your information with anyone !

Archive