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#Metoo की जगह #Wetoo कैम्पेन क्यों नहीं ?

Oct
16 2017

स्नेहा चौहान

बीते रविवार से ट्विटर और अब फेसबुक पर #Metoo अभियान चल रहा है। हॉलीवुड के मूवी मुगल हार्वे विन्स्टिन पर एक एक्ट्रेस ने रेप का आरोप लगाया। अमेरिकी न्याय व्यवस्था इस आरोप पर छानबीन और कानूनन अपना काम कर रही है। विन्स्टिन को फिल्म इंडस्ट्री से बाहर कर दिया गया है।

इस प्रकरण के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर मानों बरसों पुराने गड़े मुर्दे कब्र से निकल आए। पहले एलिसा मिलानो ने बिना हैशटैग के सभी महिलाओं को प्रेरित किया कि अगर उन्हें उनके जीवन में कभी यौन उत्पीड़न या प्रताड़ना का सामना करना पड़ा हो तो वे #Metoo के नाम से ट्वीट करें। उनके उस ट्वीट के जवाब में 12000 से ज्यादा रीट्वीट हुए और 35 हजार से ज्यादा जवाब आए।

दरअसल यह दुनिया की आधी आबादी का यौन प्रताड़ना या हिंसा के खिलाफ खुलकर किया जा रहा प्रतिरोध है। इस संदेश को प्रचारित करने की यह एक कोशिश है कि महिलाओं के साथ इस तरह का व्यवहार बंद होना चाहिए। यह प्रतिरोध उस अमेरिकी खुले समाज से शुरू हुआ है, जहां महिलाओं के काम करने, फैसले लेने या अपने भविष्य की बेहतरी के बारे में सोचने में कोई कानूनी रोक-टोक नहीं है। वे आजाद हैं, अपनी पसंद के मुताबिक जीने के लिए। ऐसे में एलिसा के ट्वीट के जवाब में कई ट्रांसजेंडर्स और पुरुषों ने भी #Metoo कैम्पेन का समर्थन करते हुए यह बताया कि किस तरह उनके साथ भी जीवन में एक या अधिक मौकों पर यौन दुर्व्यवहार हुआ।

लेकिन अपने हिंदुस्तान में जब आधी आबादी ऐसा कोई मामला सोशल मीडिया पर उठाती है तो उसका सुर काफी कुछ बेचारगी के रूप में होता है। आवाज उठाना, प्रतिरोध करना सशक्त होने का प्रमाण है। यह सही है कि निर्भया मामले के बाद महिलाएं लोकलाज की बेड़ियां तोड़कर अपने खिलाफ ज्यादती की रिपोर्ट लिखवाने थाने पहुंच रही हैं। गिरफ्तारियां हो रही हैं, दोषियों को बाकायदा जेल भेजा जा रहा है। बड़े शहरों से लेकर ठेठ देहात तक यह बदलाव आया है। इसके लिए किसी हैशटैग या सोशल मीडिया कैम्पेन की जरूरत नहीं पड़ी।

सवाल यह है कि केवल #Metoo स्टेटस डालने से क्या होगा। मेरी एक मित्र ने कुछ अरसा पहले बताया था कि उसके दफ्तर में पुरुष साथी द्विअर्थी भाषा में जानबूझकर बातें करते हैं। मैंने कहा कि तुम बॉस होते हुए भी ऐसे व्यवहार को रोक क्यों नहीं पा रही हो ? उसका कहना था कि हमें नौकरी करनी है और उन्हीं लोगों के बीच में रहना है। अब वही मित्र #Metoo के समर्थन में है। विशाखा गाइडलाइन को लागू हुए 4 साल बीत गए, लेकिन उन मोहतरमा के दफ्तर में कोई शिकायत पेटी नहीं है। तो आज वह सोशल मीडिया पर इस कैम्पेन का समर्थन कर अपने लिए लाइक जुटा रही हैं, या सिस्टम बदलने की कोशिश कर रही हैं ?

यह तो हुई आधी से कुछ कम आबादी की बात। बाकी की पुरुष आबादी में भी ऐसे ढेरों पुरुष मिल जाएंगे, जिन्हें या तो कार्यस्थल पर या फिर रास्ते या किसी सुनसान जगह पर यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। इकोनॉमिक टाइम्स और सायनोवेट के एक संयुक्त सर्वे (2010) में यौन उत्पीड़न के शिकार 7 बड़े शहरों के पुरुषों का प्रतिशत 19 से 66 (दिल्ली में) था। सबसे ज्यादा मामले स्कूली बच्चों के साथ सामने आते हैं। मेरे एक मित्र को जब यौन उत्पीड़न झेलना पड़ा, जब वह दसवीं कक्षा में था। उस रात की याद उसे आज भी किसी बुरे सपने की तरह जगा देती है। लेकिन क्या मजाल कि अपने हिंदुस्तान में पुरुष और ट्रांसजेंडर भी आगे बढ़कर #Metoo कैम्पेन को सपोर्ट करें और खुलकर अपने साथ हुए जुल्म की दास्तां लिखें।

लैंगिक समानता की बात करना और उसे व्यवहार में लाना बिल्कुल उसी तरह है, जैसे मोहल्ले का बनिया मुस्कुराकर आपको तौल कांटा दिखाकर बड़ी आसानी से अपना हिस्से का वजन झुका लेता है। इस तरह के कैम्पेन न तो सिस्टम और सोच को बदलने में मददगार हैं और न ही खुद को बदलने में। यह बात हो सकता है कि महिलावादियों को कड़वी लगे पर सच तो यही है कि सहमति और असहमति का बारीक सा धागा तभी टूट जाता है, जब आप तुरंत कोई कार्रवाई नहीं करते। मुमकिन है कि आपके पास ऐसा न करने की दलीलें हों, लेकिन कट-पेस्ट एंड शेयर की सलाह देने से पहले 10, 15 या 20 साल पुरानी कब्र खोदकर गढ़े मुर्दों को जिंदा करने की कोशिश करने वाली महिलाओं को आइने में अपना चेहरा देखकर यह जरूर सोचना चाहिए कि उन्होंने उसी समय प्रतिरोध क्यों नहीं किया ? अगर वे उस समय मासूम और हालात से अनजान थीं तो भी गुड और बैड टच और आपके साथ दुर्व्यवहार करने वाले की नीयत का पता चल ही जाता है, फिर चाहे वह पिता, चाचा, मामा या ताऊ क्यों न हो।

पुरुषों और ट्रांसजेंडरों के लिए प्रतिरोध करना और भी मुश्किल है, क्योंकि समाज उन्हें कमजोर नजर से नहीं देखता। लेकिन उन छोटे मासूम बालकों का क्या, जो शर्म और अपने पुरुष होने के नाते आपबीती को बहुत सहजता से नहीं बता पाते ? तो फिर सोशल मीडिया पर किसी न किसी तरह यौन उत्पीड़न से पीड़ित हिंदुस्तानी औरतें #Metoo की जगह #Wetoo कैम्पेन क्यों नहीं चलातीं। इससे कम से कम वे चेहरे भी तो सामने आएं, जिनमें से अधिकांश को किसी न किसी मजबूरी में ही सही, उसी आधी आबादी ने प्रताड़ित किया है, जो आज बेचारी बनी हुई है। आखिर जेंडर समानता का भी यही तो मतलब है।

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स्नेहा चौहान

स्नेहा चौहान सामाजिक सरोकारों को लेकर सक्रिय स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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