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साहित्य, शिक्षा, संस्कृति और भाषा के रचनाकारों के बीच वैश्विक विमर्श की शुरुआत है "विश्व रंग" - संतोष चौबे

Oct
31 2019

भोपाल में 4 से 10 नवंबर तक आयोजित होने जा रहे विश्व रंग के सम्बन्ध में टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव के निदेशक संतोष चौबे से हुई विस्तृत चर्चा के महत्वपूर्ण अंश - सम्पादक

प्रश्न- देश के किसी भी विश्व विद्यालय ने इसके पहले "विश्व रंग" यानी साहित्य एवं कला के अंतर्राष्ट्रीय आयोजन के बारे में नहीं सोचा। "विश्व रंग" की विश्व अवधारणा क्या है?

उत्तर- विश्व रंग की अवधारणा, विश्व के बारे में हमारी समझ से ही निकलती है। आप सचेत रूप से अपने आस-पास देखें तो पाएंगे कि विकास की जो प्रक्रिया हमने अपनाई है और प्रकृति का जिस तरह अंधाधुंध दोहन किया है वह स्वयं हमारे अस्तित्व के लिये ही घातक है। दूसरी ओर बायोटेक्नॉलॉजी एवं बायो इनफर्मेटिक्स के कन्वर्जेंस से जिस तरह के मनुष्य के निर्माण की बात की जा रही है उससे इस बात में भी संदेह पैदा होता है कि क्या मनुष्य स्वयं वैसा बचा रह पाएगा जैसा कि हम उसे जानते हैं। तीसरे, टेक्नॉलॉजी ने जीवन की गति इतनी तेज कर दी है कि उसे जानना-पहचानना ही मुश्किल होता जा रहा है। जैसा कि फ्रेडरिक जेम्सन ने कहा है, हमें नये नक्शे और नये को-आर्डिनेट्स की तलाश करनी होगी। मुझे लगता है कि जीवन के नये उपकरणों को तलाशने के साधन विज्ञान के पास उतने नहीं हैं जितने कला, संस्कृति और संगीत के पास हैं। विश्व के तमाम रचनाकारों, कलाकारों और संगीतज्ञों को इस संबंध में बातचीत शुरु करनी चाहिये और एक प्रभावी हस्तक्षेप करना चाहिये। विश्व रंग इसी दिशा में एक शुरुआत है।

प्रश्न- इस कार्यक्रम का उद्देश्‍य क्‍या है?

उत्तर- जैसा कि मैंने ऊपर कहा, विश्व रंग साहित्य, शिक्षा, संस्कृति और भाषा में काम करने वाले रचनाकारों के बीच वैश्विक विमर्श की शुरुआत है। इसके दौरान कम से कम दस ऐसे प्रकाशन सामने आयेंगे जो इस समझ को प्रतिबिम्बित करते हैं। देश और विदेश के लगभग 50 विश्वविद्यालय भी इसमें हिस्सा ले रहे हैं, जिनमें आपसी बातचीत एवं शैक्षणिक नेटवर्क का निर्माण इस कार्यक्रम का बड़ा हासिल होगा। देशभर से लगभग 500 शीर्षस्थ रचनाकार इसमें शिरकत कर रहे हैं, और उम्मीद है कि उनके बीच संवाद का रिश्ता कायम होगा और सबसे बढ़कर, हिन्दी और भारतीय भाषाओं को केन्द्रीयता प्रदान करने का प्रयत्न किया जायेगा।

प्रश्न- विश्व रंग में साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, दर्शन, लोक, नाटक, फिल्म, चित्रकला, इतिहास, मीडिया आदि के लगभग 60 सत्र हैं। इनके माध्यम से आप क्या कहना चाहते हैं?

उत्तर- वनमाली सृजन पीठ और रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय का जो लगभग 35 वर्षों का साहित्य एवं कलाओं में काम करने का अनुभव है वह बताता है कि अंततः सभी कलाओं और अनुशासनों में एक तरह की आपसदारी बनती है और उसे पहचानना ही अपने कलात्मक क्षितिज का विस्तार करना है। इसी तरह अन्य अनुशासन भी कलात्मक विधाओं में हस्तक्षेप करते हैं। मसलन उपन्यास और कहानी में मिलान कुन्देरा, पाओलो कोहेलो और उदयप्रकाश के यहां आपको ऐसी शैलियों और अनुशासनों की छाया मिल जायेगी जिन्हें पहले उपन्यास या कहानी के डोमेन में नहीं रखा जाता था, उनमें आप इतिहास की, चित्रकला की, फिल्म तकनीक की, नाटक की और दार्शनिक निष्कर्षों की छाया पाते हैं। असल में ज्ञान-विज्ञान का विस्फोट जो हमारे आसपास हुआ है, उसने बहुत सारी पुरानी सीमा रेखाओं को तोड़ा है और उपरोक्त सभी सत्रों को आयोजन में शामिल करने का लक्ष्य इस नये उभरते मानचित्र को पहचानना है।

प्रश्न- विश्व रंग में साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, साहित्य और कलाएं यहाँ तक कि अभिलेखागारों का महत्व भी शामिल है। ये किसी भी लिटरेचर फेस्टिवल के हिस्से नहीं होते, ये विश्व रंग में क्यों? सारे उत्सव-महोत्सव पॉपुलर सब्जेक्ट्स और फीचर्स के बिना नहीं होते। ऐसे में इन सबके पीछे आपकी दृष्टि क्‍या है?

उत्तर- पहली बात तो विश्व रंग पॉपुलर सब्जेक्ट्स को खारिज नहीं करता बल्कि पॉपुलर और अकादमिक सत्रों के बीच एक अद्भुत संतुलन बनाने की कोशिश करता है। जहां एक ओर लोक और शास्त्र, शिक्षा और विज्ञान और भाषाओं पर केन्द्रित सत्र हैं तो दूसरी ओर अन्तर्राष्ट्रीय मुशायरा, उर्दू की रवायत में सुखन की महफिल और रघु दीक्षित जैसे पॉपुलर बैंड्स भी हैं जो युवाओं के लिये आकर्षण का केन्द्र होंगे। यहाँ तक कि अकादमिक सत्रों में भी लीक को छोड़कर थर्ड जेंडर का कविता पाठ, सोशल मीडिया पर सक्रिय रचनाकार तथा लेखक से मिलिए में स्वानंद किरकिरे, आशुतोष राणा और इरशाद कामिल जैसे फिल्म के रचनाकार हैं जो हिन्दी के वरिष्ठ रचनाकारों के साथ नजर आयेंगे। मुझे विश्वास है कि यह उत्सव पूरी तरह सफल होगा।

प्रश्न- कला इतिहास पर नेशनल सेमिनार और कलाकारों के वर्कशॉप की जगह आर्टिस्ट्स मीट, कला प्रदर्शनी भी उन कलाकारों की जो गांव, कस्बों और दूरदराज के हैं। साथ में 50,000/- के 5 पुरस्कार, 175 चित्र आदि। इसकी अवधारणा में क्या कुछ है?

उत्तर- जैसे कि साहित्य ने अपने आप को जमीन से काटकर बड़े शहरों पर केन्द्रित कर लिया है, वैसे ही स्थापित कला दीर्घाओं में भी व्यावसायिकता हावी है और उभरते चित्रकारों के लिये, जो गांव, कस्बों और दूरदराजों के स्थानों से आते हैं कोई जगह नहीं है। हमारी कोशिश है कि उन्हें पहचाना जाए और उन्हें प्रदर्शित किया जाए। जिस तरह का रिस्पांस इस प्रयास को मिला है, वह बताता है कि इन कलाकारों में किस तरह की छटपटाहट है। करीब एक हजार से अधिक प्रविष्टियों हमें प्राप्त हुई हैं जिनके रंगों और आकृतियों के प्रयोग अद्भुत, अछूते एवं अनोखे हैं। हम इसे वार्षिक इवेंट बना सकते हैं। यह कला की दुनिया में भी एक नया प्रयोग होगा।

प्रश्न- इसमें टैगोर के नाटक, बैले, रबींद्र संगीत, रबींद्र की चित्र प्रदर्शनी और प्रकाशन भी हैं। 22 सत्र लेखकों के हैं। दीगर 36-38 और हैं। अब यह कोई दीर्घकालीन योजना है, या एक बार की दीवानगी।

उत्तर- सबसे पहले तो अर्ज करूं कि हमारे विश्विद्यालय का नाम ही गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के नाम पर है और ये हिन्दी भाषी क्षेत्र में स्थित है। जैसे-जैसे हम काम करते हैं तो पाते हैं कि लगभग पूरे हिन्दी भाषी क्षेत्र में टैगोर की विराट रचनात्मकता, विशेषकर उनकी पेंटिंग स्टाइल एवं नाटकों को लेकर कोई बहुत चेतना नहीं है और इसकी पुर्नस्थापना आवश्यक है। हमारे अपने देश के दिग्गज कलाकार, वो किसी भी प्रदेश के हो सकते हैं, को हमारे यहां के साहित्य महोत्सव में रेखांकित किया जाना चाहिये। इसलिये हमने चार दिन के साहित्य समारोह के पहले, तीन दिवसीय टैगोर रेट्रोस्पेक्टिव भी रखा है। आगे चलकर अन्य प्रदेशों के बड़े कलाकारों पर भी फोकस करेंगे। हमारा दूसरा वैचारिक आधार, जिसने सत्रों के डिजाइन में भूमिका निभाई है वह भाषाई विमर्श पर आधारित है। आप देखिये कि राजनीति ने हमारे देश में सारी भारतीय भाषाओं को एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने का काम किया जबकि वे सहोदर हैं और एक-दूसरे से बड़ी ताकत पा सकती हैं। वैसे ही बोलियों को भी हिन्दी के खिलाफ खड़ा करने का प्रयास है जबकि स्वयं हिन्दी भाषा अपना रस इन जीवन सिक्त बोलियों से ही प्राप्त करती है। अतः बोलियों और भाषाओं पर सत्र है जोकि हमारी उपरोक्त अवधारणाओं को अभिव्यक्त करेंगे। आगे के फेस्टिवल भी इन्हीं अवधारणाओं पर आयोजित होंगे। हो सकता है फोकस अलग-अलग समय में अलग-अलग हों।

प्रश्न- विश्व रंग में जानकारी के अनुसार विश्व भाषा के कवि, प्रवासी लेखक और शिक्षाविदों सहित लगभग 60 लोग आ रहे हैं। इनकी क्या भूमिकाएं हैं?

उत्तर- जब हम भारतीयता पर जोर देते हैं तो ये कोई जड़ राष्ट्रीयता नहीं है। हमारी भारतीयता वैश्विक संदर्भों से जुड़े और अपने अनोखेपन में प्रकाशित भारतीयता है जिसमें विश्व कविता का भी उतना ही स्थान है जितना भारतीय कविता का। ये शायद पहली बार होगा कि किसी फेस्टिवल में विश्व कविता के दो सत्र आयोजित हैं। इसी तरह प्रवासी भारतीय लेखक भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहते हैं लेकिन उनके लेखन के प्रकाशन और मूल्यांकन को लेकर कोई ठोस प्रयास देश में नहीं होते। विश्व के प्रमुख प्रवासी भारतीय लेखकों को आमंत्रित करने का लक्ष्य है कि उनसे संवाद कायम किया जाये एवं उनके साहित्य के मूल्यांकन के प्रयास किये जायें। इस समय भारत के बाहर करीब 66 विश्वविद्यालय ऐसे हैं जहां हिन्दी पढ़ाई जाती है। इनके साथ सहयोगी वातावरण बन सके इसलिये इन्हें भी आमंत्रित किया गया है। अंततः वैश्विक हिन्दी के निर्माण में इनकी बड़ी भूमिका होगी।

प्रश्न- इस महोत्सव का आगाज उत्तर भारत के 50 गांवों, कस्बों, जिलों से पुस्तक यात्रा के साथ हुआ। फिर हजारीबाग, वैशाली, बिलासपुर, खंडवा और भोपाल में तीन दिवसीय युवा उत्सव हुए। इतनी सांस्कृतिक भव्यता का देश समाज के लिए क्‍या महत्‍व है?

उत्तर- जिस तरह हमारे गांव व कस्बों ने पुस्तक यात्राओं को हाथोंहाथ लिया उससे उम्मीद बनती है कि पुस्तक संस्कृति अभी हमारे देश में जीवित है। बच्चे और युवा किताबें पढ़ना चाहते हैं, हम ही उन तक नहीं पहुंच पाते। पुस्तक यात्रा इस भ्रम को तोडती है कि किताबों के पाठक कम हो रहे हैं। वो बताती है कि किताबें अब भी बातें करती हैं, और व्यापक भारतीय समाज में ज्ञान की भूख अभी बरकरार है। ये सांस्कृतिक भव्यता नहीं बड़ी जरूरत की पहचान है। हम अगले एक साल में एक लाख से अधिक पुस्तक मित्र बनाने का प्रयास करेंगे।

प्रश्न- दिल्ली में भी 11 अक्टूबर को टैगोर पर आयोजन है और नोबल लारेट्स की कविताओं का अनुवाद का प्रोग्राम है। इसे दिल्‍ली में ही करने की कोई खास वजह?

उत्तर- आईसेक्ट आज देश का लगभग सबसे बड़ा सामाजिक उद्यमिता आधारित नेटवर्क है और वह समाज के पास जाने में विश्वास रखता है। दिल्ली में इस कार्यक्रम को करने का मूल कारण नेशनल मीडिया की वहाँ उपस्थिति, अधिकतर अनुवादकों की उपलब्धता और एक नये समूह के बीच अपनी बात कहने की ललक है।

प्रश्न- यह जो विश्व रंग की शुरुआत है इसका भविष्य क्या है?

उत्तर- तेजी से बदलते समय में कोई भी भविष्य की घोषणा नहीं कर सकता पर विश्व रंग एक ऐसी रचनात्मक समावेशी प्रक्रिया की शुरुआत करना चाहता है, जिसमें कलाएं मानव व मानवीय संवेदनाओं के पक्ष में खड़ी हों, सस्टेनेबल डेव्लपमेंट हमारी चिन्ता के केन्द्र में हो और हिन्दी और भारतीय भाषाओं को विश्व में उचित स्थान मिले, रचनात्मक विस्तार की जगह मिले। राष्ट्र के भीतर उनमें आदान-प्रदान बढ़े। आगे भी हमारी कार्यवाही का आधार उपरोक्त अवधारणायें ही होंगी। विचार के साथ-साथ एक्शन पर भी बल देंगे। इसी से आगे के रास्ते प्रकाशित होंगे।

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