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आज की राजनीति अंग्रेजों से उधार ली हुई है : प्रो़ रामजी सिंह

Sep
30 2019

मनोज पाठक

लंबे, दुबले-पतले, खद्दरधारी, कंधे में झोला लटकाए, चाल में किसी युवा से भी अधिक फुर्ती, देश के करीब हर कोने में गांधी समागम में दिख जानेवाले, युवकों के साथ घुलने-मिलने वाले प्रोफेसर रामजी सिंह की पहचान आज भी यही है, जो वर्षो पहले थी।

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गांधीवादी चिंतक के रूप में प्रसिद्ध रामजी सिंह ने वर्ष 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के साथ-साथ सन् 1974-75 के छात्र आंदोलन में भी शिरकत की। लगभग बीस माह तक मीसा एक्ट के अंतर्गत बंदी रहे। वर्ष 1977 में भागलपुर से सांसद निर्वाचित हुए, लेकिन इन्होंने चुनाव लड़ने के लिए एक पैसा खर्च नहीं किया था।

सिंह ने आईएएनएस के साथ विशेष बातचीत में कहा, "मैं जब चुनाव लड़ा तो अपराधियों के गढ़ तक में गया, लेकिन कभी किसी ने चोट नहीं पहुंचाई, बल्कि वो हमसे डरते थे। अब तो ये सब कुछ सपने जैसा लगता है। आज मैं चुनाव लड़ना चाहूं, तो लोग मेरी जात पूछेंगे।"

उन्होंने दावे के साथ कहा, "मैं सांसद रहते हुए भी साइकिल से गांव-गांव जाता था और लोग साइकिल रोककर मुझसे बात कर लेते थे, अपनी समस्या बता देते थे। आज भी आप उस क्षेत्र में जाकर पूछ सकते हैं।"

प्रो. सिंह ने आज की राजनीति में बदलाव का जिक्र करते हुए कहा कि आज जनता के हित की राजनीति नहीं हो रही है, केवल राजनीतिक दलों के प्रमुखों के दिशा-निर्देशों पर ही राजनीति हो रही है।

उन्होंने कहा, "यदि जनता की आवाज सुनी जाती तो निर्णय जनमत से लिए जाते। आज राजनीति में नीति नहीं है, सिद्धांतविहीन इस राजनीति का कोई आधार नहीं है। आज की राजनीति को बदलना होगा, यह अंग्रेजों से उधार ली गई राजनीति है।"

बिहार के मुंगेर में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे सिंह पटना विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर, जैन धर्म पर पीएचडी, राजनीति विज्ञान के अंतर्गत विचार में डी़ लिट् कर प्रो़ सिंह हिंद स्वराज पर यूजीसी के ऐमेरिटस फेलो रह चुके हैं।

पचास से अधिक पुस्तकों का लेखन एवं संपादन कर चुके सिंह के हजारों लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में देश-विदेश में प्रकाशित हुए हैं। गांधी विचार और सामाजिक साधना सवरेदय से जुड़े रहने के कारण उनकी ख्याति पूरी दुनिया में गांधी-विचारकों के गूढ़ अध्येता के रूप में है।

लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 113 जयंती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सम्मानित सिंह कहते हैं कि गांधी विचारधारा भारतीय संस्कृति और वांग्मय का नवनीत है। गांधीजी ने अहिंसा के रास्ते छोटे-छोटे आंदोलन से पहले देश की जनता का मानस तैयार किया और फिर 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया। देश आजाद जरूर हो गया, लेकिन गांधीजी जिन-जिन मुद्दों पर जोर देते थे, वे आज भी बरकरार हैं।

बकौल सिंह, "गरीबी और बेकारी के साथ गैर बराबरी की समस्या दूर होने पर ही भारत सच्चे अर्थो में स्वाधीन होगा।"

वे कहते हैं कि गांधी को समझना है तो उनका साहित्य पढ़ना होगा, ना कि सुनी-सुनाई बातों पर अपना मत बनाया जाए। गांधी जी के पूरे दर्शन को समझने के लिए एक ही किताब पढ़ी जानी चाहिए और वो है हिंद स्वराज। जीवन के उलझे सवालों का जवाब देना ही दर्शनशास्त्र का बुनियादी उद्देश्य है। भौतिकता की आंधी में हमने अपने पर्यावरण का भी नाश कर दिया है, जिसका समाधान अपरिग्रह सिद्धांत के द्वारा ही संभव है।

गांधीजी को विज्ञान का विरोधी बताए जाने को नकारते हुए सिंह बेबाक कहते हैं, "यह वास्तविकता से अलग है। गांधीजी आत्मज्ञान एवं विज्ञान के समन्वय पर बल देते थे। उनका कहना था कि आत्मज्ञान के बिना विज्ञान अंधा है और विज्ञान के बिना आत्मज्ञान पंगु है।"

अपने जीवन को गांधी के विचारों के प्रति समर्पित करने वाले सिंह कहते हैं कि देश के सामने सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी एवं विषमता है। उन्होंने कहा कि आज देश में आर्थिक विषमता की दर 27 प्रतिशत पहुंच चुकी है। इसका मतलब है कि एक व्यक्ति के पास इतनी दौलत है जो 27 व्यक्तियों के पास नहीं है।

भागलपुर विश्वविद्यालय के शिक्षक रहने के दौरान विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के लिए कार्य करने वाले सिंह ने शैक्षिक प्रयोजन से दुनिया के बीस से अधिक देशों की यात्रा की है।

गांधी, विनोबा और जयप्रकाश के विचारों के प्रखर प्रवक्ता के रूप में पहचान बनाने वाले सिंह बिहार सवरेदय मंडल के अध्यक्ष के रूप में बिहार के विभिन्न जिलों में भूदान किसानों की बेदखली को लेकर लगातार सत्याग्रह आंदोलन चलाया।

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के कुलपतित्व काल में जब भागलपुर विश्वविद्यालय में गांधी विचार के अध्ययन अध्यापन का प्रस्ताव रखा गया था, तब प्रो़ सिंह ने उन्हें कार्यरूप दिया। परिणामस्वरूप 1980 में भागलपुर विश्वविद्यालय में गांधी विचार की पढ़ाई आरंभ हुई और वे इस विभाग के संस्थापक विभागाध्यक्ष बने। गांधी विचार विभाग के संस्थापक अध्यक्ष रहते सिंह ने अपनी पांच हजार पुस्तकें और हस्तलिखित नोट्स विभाग को दे दी थी, इसमें अधिकांश गांधी के विचारों से ही जुड़े थे।

आज देश-दुनिया में हो रही हिंसा के विषय में पूछे जाने पर उन्होंने आईएएनएस से कहा, "हम विश्व को केंद्र में रखें और आणविक युद्ध के कगार पर खड़ी दुनिया को बचाने का सामूहिक प्रयास करें। आत्मज्ञान के बिना अहिंसा की शक्ति प्राप्त नहीं होती।"

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