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विशेष: ड्राइविंग स्कूल से महिलाओं को लगे पंख

Dec
30 2018

ब्रिज खंडेलवाल
मथुरा/आगरा, 30 दिसम्बर (आईएएनएस)। मुगलों के ऐतिहासिक शहर आगरा में आजकल भीड़भाड़ वाले किसी चौराहे पर अक्सर दोपहिया वाहनों पर सवार अनेक महिलाएं दिखती हैं, जिनमें न सिर्फ युवतियां बल्कि गृहणियों समेत अधेड़ उम्र की महिलाएं भी होती हैं। ये महिलाएं अब खुद दोपहिया वाहन चलाने का लुत्फ उठाती हैं और पूरी आजादी से घूमती हैं।

ऐसा ही दृश्य आगरा के पास के शहर मथुरा में भी देखा जा सकता है।

मथुरा निवासी पावनी खंडेलवाल मानती हैं कि छोटे शहरों में दोपहिया वाहनों की सवारी से अधेड़ उम्र की गृहणियों की जिंदगी बदल सकती है जहां साड़ी छोड़कर सलवार सूट पहनना भी किसी क्रांति से कम नहीं माना जाता।

वह कहती हैं कि स्कूटी चलाना आने से महिलाओं का सशक्तीकरण हो सकता है क्योंकि इससे उनमें आत्मनिर्भरता आती है।

यही कारण है कि जब उन्होंने केवल महिलाओं के लिए स्कूटर ड्राइविंग स्कूल शुरू किया तो उनको इसके लिए 'आत्मनिर्भर' से अच्छा कोई दूसरा नाम नहीं सूझा।

स्कूल की टीचर मीरा गुप्ता ने कहा, साइकिल अब फैशन में नहीं रही। अधिकांश महिलाएं स्कूटी या इलेक्ट्रिक स्कूटर चलाना पसंद करती हैं। स्कूलों की छुट्टी होने पर यहां अक्सर अपनी कमर से बच्चे को चिपकाए कई महिलाएं स्कूटर पर स्कूल से लौटती दिखतीं हैं।

उन्होंने कहा, आप लड़कियों को लड़कों से होड़ लेते देख सकते हैं जो खुद को किसी भी सूरत में दूसरे नंबर पर नहीं देखना चाहती हैं।

तेइस साल की पावनी को महिला ड्राइविग स्कूल की जरूरत तब महसूस हुई जब उनकी मां रेखा खंडेलवाल ने स्कूटी चलाना सीखने की इच्छा जताई। रेखा कभी साइकिल भी नहीं चला पाई थीं।

पावनी ने आईएएनएस से बातचीत के दौरान कहा, "मैं सात साल से दोपहिया वाहन (फिलहाल बुलेट मोटरसाइकिल) चला रही हूं और मेरा यह मानना था कि अधिकांश पुरुष व महिलाएं पहले से ही दोपहिया वाहन चलाना जानते हैं।"

लेकिन, जब उनकी मां ने स्कूटी चलाना सीखने की इच्छा जताई तो उनके लिए महिला प्रशिक्षण की तलाश सचमुच मुश्किल काम साबित हुआ।

पावनी ने कहा, "तब, मैंने महसूस किया कि यह बुनियादी सा कौशल भी महिलाओं के लिए सीखना कितना मुश्किल है, क्योंकि उनके घर के पुरुषों के पास महिलाओं को ड्राइविंग सिखाने का धर्य नहीं है और छोटे शहरों में महिलाएं पुरुष प्रशिक्षकों से खीखने में खुद को बहुत सहज नहीं पाती हैं।"

उन्होंने बताया, "जब मैंने अपनी मां के लिए महिला प्रशिक्षक की तलाश शुरू की जो मुझे महसूस हुआ कि हर परिवार में एक न एक महिला को स्कूटी चलाना सीखने की जरूरत है और हर परिवार में इसकी चाहत है। इसके अलावा, मैंने पाया कि ज्यादातर महिलाएं, खासतौर से गृहणियां महज आवागमन की जरूरत के लिए स्कूटी नहीं चलाती हैं, बल्कि उनको इससे यौवन और आजादी का अहसास होता है।"

यह जानकर पावनी ने अपनी मां और उनकी जैसी दूसरी महिलाओं की मदद के लिए एक साल पहले नवंबर में मथुरा में सिर्फ महिलाओं के लिए ड्राइविंग स्कूल खोला। आत्म निर्भर नाम से यह ड्राइविंग जब खुला था तब इसमें महज दर्जनभर महिलाएं प्रशिक्षण ले रही थीं। लेकिन, अब महज एक साल में इसका तेजी से विस्तार हुआ और आगरा, भरतपुर, जयपुर और वृंदावन में भी महिला ड्राइविंग स्कूल खुल गए, जिनमें 1100 से अधिक महिलाएं प्रशिक्षण ले रही हैं।

इस पहल को उत्तर प्रदेश के परिवहन मंत्रालय और केंद्र सरकार के स्टार्टअप इंडिया कार्यक्रम द्वारा मान्यता प्रदान की गई है।

पावनी ने बताया कि देश में जहां सार्वजनिक परिवहन का कोई भरोसा नहीं रहता है, वहां खासतौर से छोटे शहरों में ज्यादातर महिलाओं को बच्चों को स्कूल ले जाने या लाने, खरीदारी के लिए बाजार जाने आदि कई कामों के लिए घर से बाहर जाने के लिए अपने पति या भाई व रिश्तेदारों पर निर्भर रहना पड़ता है या फिर उनके लिए ऑटोरिक्शा एक विकल्प बच जाता है।

उन्होंने बताया कि 'आत्म निर्भर' में दाखिला लेने वाली अधिकांश महिलाएं साइकिल चलाना भी नहीं जानती हैं। उनको दस दिन से ज्यादा समय तक एक-एक घंटे का रोजाना प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है, जिसके बाद वह पूरे विश्वास के साथ स्कूटी चला सकती हैं। निपुणता के साथ ड्राइविंग सीखने पर उनको इसका प्रमाण पत्र प्रदान किया जाता है।

स्कूल में सभी महिला प्रशिक्षु होती हैं, इसलिए उनकी सहूलियत को ध्यान में रखकर ही उनके प्रशिक्षण का समय तय किया जाता है। स्कूल में प्रशिक्षिकाएं भी महिलाएं ही हैं, जो प्रशिक्षुओं को उनके घर से लाती हैं और प्रशिक्षण-सत्र के बाद उनको वापस उनके घर छोड़ती हैं। इससे संगठन पर न सिर्फ महिलाओं, बल्कि उनके परिवारों का भी भरोसा बढ़ गया है।

ज्यादातर प्रशिक्षिकाएं कमजोर परिवारों से आती हैं, जिनके लिए नौकरी के नए अवसर खुल गए हैं और इससे उनको आत्मनिर्भर बनने में मदद मिली है।

पावनी ने शुरुआत में ही एक फेसबुक पेज बनाया और उसके जरिए वह महिलाओं से संपर्क कर उनको अपने ड्राइविंग स्कूल के बारे में बताने लगीं। स्कूटी चलाना सीखने को उत्सुक 16 साल से 60 साल की उम्र की महिलाओं ने फेसबुक पेज ज्वाइन किया, जिनमें ज्यादातर महिलाएं अधेड़ उम्र की गृहणियां थीं।

पावनी ने कहा, "अगले दो साल में हम भारत के दूसरी और तीसरी श्रेणी के हर शहर में इसका विस्तार करना चाहते हैं।"

विश्व महिला दिवस पर (8 मार्च को) 'आत्मनिर्भर' ने महिलाओं के लिए एक उद्यमी सम्मेलन का आयोजन किया, जिसमें 150 से ज्यादा महिला कारोबारी व नई उद्यमियों ने हिस्सा लिया।

पावनी ने कहा, "आत्मनिर्भर न सिर्फ एक कंपनी है बल्कि एक विचार है जिसने हजारों महिलाओं को अपनी आजादी व आत्मनिर्भरता प्रेरित किया है और इससे लगातार उनको प्रेरणा मिलती रहेगी।"

(यह साप्ताहिक फीचर श्रंखला आईएएनएस और फ्रैंक इस्लाम की सकारात्मक पत्रकारिता परियोजना का हिस्सा है।)

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